साकी नहीं मैं, की पैमाना सजा दूँ ..
नाचीज दिल है इसकी क्या रजा दूँ ..
तेरी महफ़िल में आया की होश में ना रहूँ...
ला इस खुशी के लिए खुद को सजा दूँ
हमारी ख़ामोशी को वो क्यों बेरुखी समझते हैं
हम हैं की इजहारे मुहब्बत भी नहीं करते हैं
नहीं कौफ की अंजामे मुकद्दर क्या होगा
फिर भी क्यों तुझे पाकर हम खोने से डरते हैं