जब चलना सीखा था तब ये ना सोचा था
कि चलते चलते इतनी दूर चले आयेंगे |
मुड कर वापस जाने की जब सोची
तब याद आया, सोचा न था वापस कैसे जायेंगे |
अंजानो से जान हुई ,
कुछ ना जाने क्यूँ अनजान हुए |
कुछ से लम्बा नाता था,
कुछ चन्द दुरी के महमान हुए |
उसको बोला था रुक,
वापस आकर तेरे संग जायेंगे |
मुड कर वापस जाने की जब सोची
तब याद आया, सोचा न था वापस कैसे जायेंगे |
मंजिल क्या थी पता नहीं था,
रस्ते पर ही पहचान हुई |
चाहत जगी फिर उड़ने की ,
चाहत जगी फिर उड़ने की ,
ना जाने कब गुल से ये गुलफाम हुई |
उसको बोला था रुक ,
बस अम्बर छू कर आ जायेंगे |
मुड कर वापस जाने की जब सोची
तब याद आया, सोचा न था वापस कैसे जायेंगे |
आज शिखर पर खड़े अकेले
साहस की बातें करता हूँ |
पर जिन राहों से आया था
उन पर वापस जाने में डरता हूँ |
साहस की बातें करता हूँ |
पर जिन राहों से आया था
उन पर वापस जाने में डरता हूँ |
उसको बोला था रुक ,
तेरी एक आवाज पे ही आ जायेंगे |
मुड कर वापस जाने की जब सोची
तब याद आया, सोचा न था वापस कैसे जायेंगे |
देख रही हैं तेरा रास्ता
सुनी आँखें अब उन राहों पर |
जीने की बस एक तमन्ना
दम निकले उन यांदों की बाँहों पर |
उसने बोला था रुक
तू ना आया तो तुझको लेने आ जायेंगे |
सुनी आँखें अब उन राहों पर |
जीने की बस एक तमन्ना
दम निकले उन यांदों की बाँहों पर |
उसने बोला था रुक
तू ना आया तो तुझको लेने आ जायेंगे |
मुड कर वापस जाने की जब सोची
तब याद आया, सोचा न था वापस कैसे जायेंगे |
रजनीश .....

Bahut Khoob Pandeyji.....
ReplyDeleteThanks Salman bhai!
ReplyDeleteबहुत उम्दा
ReplyDeleteBahut khub kahi mere dost...feelings are very touchy.
ReplyDeleteVery Gud Rajneesh...
ReplyDeletethis one is damn gud!
ReplyDeleteThanks a lot friends!!
ReplyDeleteBahut hi mast.. too good poet.. :)
ReplyDeleteGrt Rajneesh-you write very wel.. tune muje kabhi bola nahi ki tum itana acha likhte ho:)..really its good.
ReplyDeleteThanks Aru..:-)
ReplyDelete