कॉलेज की डायरी के पन्नों को पलटते हुए आज अचानक इस कविता पर नजर गई जो की अलग ही शैली और भाव में रचित है | बारिश की महत्ता एक किसान के लिए क्या होती है उसका वर्णन करने का एक प्रयास था |
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
खेतों को फिर इक बार लहलहाने मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
कुपित हैं इन्द्रदेव वर्षों से
भूले खेत मुस्कुराना सरसों से
सूरज ने है खूब तपाया
बूंद बूंद से हमें सताया
प्यासी धरती की प्यास बुझाने, मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
हो गए हैं अब बीज उदास
पुनर्प्रक्रम ने छिनी इनकी आस
टूटा जब बैलों का जोड़ा
जो थोडा जोड़ा उससे जोड़ा
हारे इन मनों से जिताने, मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
पलायनवादी बना रही मुझे वो
बच्चों के सूखे तन दिखा रही वो
हरने पीर उनकी यह अंतिम प्रयास है
क्योंकि कहते सुना तिगुने की आस है
इस अज्ञानी तन को बतलाने, मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
फैले हैं हाँथ इस भिखारी के आगे
लौटा दे जो लिया अभागे
छुट रहे हैं अब खेत भी मेरे
लग न जाएँ जनम जनम के फेरे
इन घेरों से हमें छुड़ाने , मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
जरा फरियाद सुन ले मेरी विधाता
जरा फरियाद सुन ले मेरी विधाता
हर बार मनाया इस बार कैसे ना मनाता
तेरी विधि से लड़ने तैयार खड़ा हूँ
तुझसे कुछ पाने फिर इस बार अड़ा हूँ
सोच दया की भिक्षा हल उठवाने,मानसून फिर आया है
अरमानो के दिए जलाने मानसून फिर आया है
..................रजनीश
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पुनर्प्रक्रम ने छिनी इनकी आस--इस से तात्पर्य यह है कि जितना बोया उतना ही पाया तो अगली बार फसल के लिए बीज कैसे और कंहा से लाया जाये |
क्योंकि कहते सुना तिगुने की आस है-- हर बार की तरह मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार भी अच्छी वर्षा के अनुमान हैं |