वृछ विशाल छाओं में था फल कच्चा..
सपनों से भी प्यारा सुन्दर सच्चा ......
उसे पाने अब सब तरसने लगे हैं .......
अब उस पर पत्थर बरसने लगे हैं......
सभी जुगत भिड़ाते उसको पाने की...
कुछ खाने तो कुछ कमाने की ...........
सभी को उसके भविष्य की पडी है.....
अभी अभी उसे एक छड़ी पड़ी है .........
है हवा भी तीव्र हो रही है वृष्टि .......
पड़ रही है उस पर सबकी कुदृष्टि ...
पकने का इंतजार नहीं करते हैं ..
तोड़ लेने के लिए सब मरते हैं ..
छोड़ दो उसे अभी वो तो है कच्चा ..
आँगन में खेलता छोटा सा बच्चा..
ना छीनना बचपन अचार बनाने के लिए ..
ना छीनना बचपन आचार बनाने के लिए ..
रजनीश....