Saturday, 10 March 2012

तुलसी से तुलसी दास

क्यों प्रिये मुझे तुम छोड़ गए ,
               जग जीवन से मन तोड़ गए |
विचलित तन मन था तुम बिन ,
                  कट नहीं रहे थे ये पल छिन |
तुम बिन जीवन में कुछ न रखा है,
                 तुम बिन मेरा कौन सखा है |
आँखों से हटती नहीं तुम्हारी काया
           तुमसे मिलने रत्ना, देखो तुलसी आया |
आंधी तुफानो को पार किया है,
          सरयू के उफानो को पार किया है |
छोड़ जगत के सब काम काज,
          लो आ गया मैं तुमसे मिलने आज |
ये दिव्य प्रेम मैं दर्शाता हूँ ,
          रत्ना तुम बिन, नहीं रह पता हूँ |


घोर अचम्भि कुंठित रत्ना,
             करो तुम ऐसा, कभी न देखा सपना |
क्यों विचलित मन आन हुआ है,
             इससे प्रेम का ही अपमान हुआ हुआ है |
हाड मांस की है, बनी ये काया ,
              क्या इससे मिलने ही तुलसी आया |  
दिव्य कह रहे हो जिस प्रेम को ,
                 स्वामी; धिक् धिक् है वैसे प्रेम को |
अंश मात्र भी, राम चरण में लग जाता
                   तब यह जीवन सफल हो जाता |



भौतिकता में रमे इस मन को,
                       कितना मैं समझाता हूँ |
अर्जित है अथाह समन्दर,
                     पर उसको भी कम पाता हूँ |
विचलित अज्ञानी अभिमानी मन,
                     व्यर्थ प्रलोभन से हो चला हताश |
 कटु सत्य कहा था तब रत्ना ने ,
                   बन जाये ये तुलसी भी अब तुलसी दास  |


तो लो धिक्कारता हूँ मैं भी अपने आप को ,
             जिस तरह रत्नावली ने  धिक्कारा था तुलसी दास को |
 


 

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