क्यों प्रिये मुझे तुम छोड़ गए ,
जग जीवन से मन तोड़ गए |
विचलित तन मन था तुम बिन ,
कट नहीं रहे थे ये पल छिन |
तुम बिन जीवन में कुछ न रखा है,
तुम बिन मेरा कौन सखा है |
आँखों से हटती नहीं तुम्हारी काया
तुमसे मिलने रत्ना, देखो तुलसी आया |
आंधी तुफानो को पार किया है,
सरयू के उफानो को पार किया है |
छोड़ जगत के सब काम काज,
लो आ गया मैं तुमसे मिलने आज |
ये दिव्य प्रेम मैं दर्शाता हूँ ,
रत्ना तुम बिन, नहीं रह पता हूँ |
घोर अचम्भि कुंठित रत्ना,
करो तुम ऐसा, कभी न देखा सपना |
क्यों विचलित मन आन हुआ है,
इससे प्रेम का ही अपमान हुआ हुआ है |
हाड मांस की है, बनी ये काया ,
क्या इससे मिलने ही तुलसी आया |
दिव्य कह रहे हो जिस प्रेम को ,
स्वामी; धिक् धिक् है वैसे प्रेम को |
अंश मात्र भी, राम चरण में लग जाता
तब यह जीवन सफल हो जाता |
भौतिकता में रमे इस मन को,
कितना मैं समझाता हूँ |
अर्जित है अथाह समन्दर,
पर उसको भी कम पाता हूँ |
विचलित अज्ञानी अभिमानी मन,
व्यर्थ प्रलोभन से हो चला हताश |
कटु सत्य कहा था तब रत्ना ने ,
बन जाये ये तुलसी भी अब तुलसी दास |
तो लो धिक्कारता हूँ मैं भी अपने आप को ,
जिस तरह रत्नावली ने धिक्कारा था तुलसी दास को |
Bahut sahi pandey ji
ReplyDeletedhanyawaad mishra jee..aaj kal aap kee kalam santh hai kya??
DeleteKya baat hai pandey ji..
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